हर रिश्ते को नाम देना क्यों ज़रूरी है ,
सच कहूं तो मेरे इश्क़ ना करने की बस इक यही मजबूरी है ,
क्यों ना ऐसा हो कि मुझसे वो बेख़ौफ़ मिलने आये ,
कुछ मेरी बातों को समझे कुछ अपनी मुझे समझाए ,
रिश्तों को नाम देने से मुझे तकलीफ तो नहीं ,
पर फिर सब यही पूछते है कि बात आगे बढ़ी या रुकी है वहीं ,
कि आज जब वो साथ है तो सबसे कहूं की ऐसी मोहोबत तो मैं किसी से ना करता था ,
और जब कल वो छोड़ के जाये तो सबसे कहूं कि मैं उससे मोहोब्बत ही कहाँ करता था ,
आज मैं उसके साथ हूँ , कल रहूं ना रहूं ,
आज तो दिल की बात उससे कहता हूँ , कल कहूं ना कहूं ,
कुछ रिश्तों को नाम ना देना ही मुनासिब होता है ,
वो हमसफ़र ना था यही सोचकर दिल कुछ कम तो रोता है ,
हमने तो बेगानो से ज़्यादा मोहोब्बत पाई है ,
नाम के रिश्तों ने तो बस हमारी कीमत आज़माई है ,
गर रिश्तों को नाम देके निभाना मजबूरी है
फिर रिश्तों को नाम देना ही क्यों ज़रूरी है |
उत्कर्ष

