
हर रिश्ते को नाम देना क्यों ज़रूरी है ,
सच कहूं तो मेरे इश्क़ ना करने की बस इक यही मजबूरी है ,
क्यों ना ऐसा हो कि मुझसे वो बेख़ौफ़ मिलने आये ,
कुछ मेरी बातों को समझे कुछ अपनी मुझे समझाए ,
रिश्तों को नाम देने से मुझे तकलीफ तो नहीं ,
पर फिर सब यही पूछते है कि बात आगे बढ़ी या रुकी है वहीं ,
कि आज जब वो साथ है तो सबसे कहूं की ऐसी मोहोबत तो मैं किसी से ना करता था ,
और जब कल वो छोड़ के जाये तो सबसे कहूं कि मैं उससे मोहोब्बत ही कहाँ करता था ,
आज मैं उसके साथ हूँ ,
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