पढ़े - लिखे  भी  यहाँ  अनपढ़ हैं ,

जगह - जगह  बिखरे  पड़े  कमज़ोर  विचारों  के गढ़  हैं,



जहां  काम  नहीं  लोगों  का  उपनाम  देखा  जाएगा ,

वहां  हुनर  होते  हुए  भी  कोई  कुछ  ना  कर  पाएगा ,



यहाँ  लोगों  को अपनी  जाति  का  गुरूर  है ,

जो  नहीं  जन्मे  उनकी  जाति   में  ना  जाने  उनका  क्या कुसूर  है ,



ये  भी  तो  देश  की  समस्याएं  हैं ,

कि  हमारे  यहाँ  जातियों  में  भी  विभिन्ताएं  हैं ,



जनम  के  साथ  ही  यहाँ  लोग  छांटे  जाते  हैं ,

घर , गांव , ज़मीन ऐसे  ही  बांटें  जाते  हैं ,



उम्र  के  साथ  और  गहरा  होता  जाता  ये  घाव  है ,

जब  हैसियत  देखके  लोग  बदलते  अपना  स्वभाव  है ,


ये  तरक्की  भी  ना  जाने  क्यों  इतनी  अजीब  है ,

जहाँ  इंसान  से  इंसान  ही  नहीं  करीब  है ,



खैर  देश  बदल  भी  रहा  है , पर  काफ़ी  कसर  अभी बाकी है ,

अंबेडकर - भगत सिंह  के  विचारों  का  पूरा  होना असर  अभी  बाकी  है |






                                                                 उत्कर्ष 


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