तू है कोन,

तेरा कौन है,

ये पूछती है

खामोशी से मुझ से|


मैं थका हूँ,

बिलकुल अकेला हूँ,

बता देता  हूँ

मैं खामोशी से उसे|


ज़िंदग तू

बावल बड़े करती है,

क्यूँ बेबाक इतने

सावल सारे करती है|


कभी तो साँस लेने की

फुर्सत भी देदे,

कभी आंसू पोंछने की

मोहलत भी देदे|


कल जो दीया तूने

ज़ख्म भरने तो दे,

अभी इक नया कोई

दर्द फिर से दे|


ज़िंदगी तू

क्या कमाल करती है,

निशब्द ही इतने

सावल सारे करती है|


मेरे हौसलों की

बुलंदी तो तू देख,

भले थका हुआ हू पर

मुझे निरंतर चलता तू देख|


रुका तेरे कैसी

ठोकार दीने पर मैं,

झुका नहीं तेरे किसी

ज़िद के सामने मैं|


जिंदगी तू

सवाल बाड़े करती है,

क्यूँ ख़ामख़ा तू

वक्त बर्वाद करती है|


जा कहदे सबसे 

तुझे तेरा जवाब मिल गया,

ज़िन्दगी को जीने का

विश्वास है मिल गया|


तेरे बस में नहीं

है मुझे अब रोकना,

जो काल है वो  

तो होना ही है होना|


- उत्कर्ष भास्कर