कभी सोचता हूँ सिरहाने पर
सर रख कर, क्या मिला तुझे पाकर
आरज़ू तो दिल में बड़ेपाले थे
मुझे तेरे चाहत के कितने हसरतें थीं
पर सोचता हूँ अब तुमसे मिल कर
क्या कोई मुराद पूरी हुई हो अगर|
कितने हसीन थे पल जो हम तनहा थे
खुद को हँसा लेते और खुद ही रो लेते थे
ज़माने की कोई खबर नहीं होती थी
किसी को मानाने की तकल्लुफ़ भी नहीं थी
हम खुद से परेशां होते थे
और खुद को ही समझा लिया करते थे|
परेशानियाँ तो काफी रही ज़िन्दगी भर
चाहतों का काफिला भी रहा उम्र भर
रातों को जागना तो तब भी था
दिनों में बेकरार रहना तब भी था
शिकायतों की फेहरिश्त फिर भी इतनी लम्बी नहीं थी
शिकवा भी खुद के सिवा किसी और से नहीं थी|
लेकिन ये भी तो सच है तेरे आने से
ज़िन्दगी में रंग भरा नया फिरसे
जो बेमन कभी रोज़ आँखे खुला करती थी
तेरी खुश्बू से अब सेहर हुआ करती है
देर रात जागने का अब वजह था मिल गया
सारा सारा दिन तेरी बातों में यूँ गुज़र गया|
हमेशा तुझसे बात हो ये ज़रूरी तो नहीं
हर दिन तेरा दीदार हो ये भी मुमकिन नहीं
पर चाहत का मज़ा अलग सा दुरी में होता है
नज़दीकियो का बढ़ना साथ रहने से नहीं होता है
जो देख लूँ तेरे चहरे को चार दिन पर
बारिश की बूंदे हो जैसे दिल क रेगिस्तान पर|


