है बेलगाम जज़्बा मेरे बड़े आज कल,

कुछ ऐसा कमाल कर गया उसके आँखों का काजल...



होती है तिश्नगी अब कभी जो मेरे आँखों को,

पी लिया करता हूँ उनके चेहरे के नूर को...



हूँ जलता जो मैं धुप में अब कभी,

उनकी जुल्फों से छांव लेता मैं तभी...



मेरे रूह में घर कर गयी हो ऐसे,

उसकी ख़ुशब ही बहती हो मेरे साँसे में जैसे...



कांपते होंठों से वो क्या कुछ है कहती,

नाजाने वो मेरा नाम क्यों नहीं लेती...


-उत्कर्ष भास्कर