माँ, तेरे चेहरे अनेक हैं,
ममता के स्वरुप अनेक है|
कभी तू धुप में छाया है,
तेरे आँचल में संसार समाया है|
सब साच ही कहते, माँ
तुझमे ही ईश्वर की काया है|
माँ, तेरे अहसान बड़े है,
कहाँ कोई तेरा कर्ज़ चूका पाया है|
पसीना मेरे माथे पर होता है,
पर जाने कैसे दुप्पटा तेरा गीला होता है|
सब साच ही कहते, माँ
तुझमे ही ईश्वर की काया है|
माँ तेरे रूप कई हैं,
यूँ तो सारे हीं सुन्दर हैं|
कभी तू यशोदा सी रूठ जाती है,
फिर मरियम बन गोद में उठाती है|
सब साच ही कहते, माँ
तुझमे ही ईश्वर की काया है|
माँ ये जीवन तेरा दिया है,
संसार में ये हक सिर्फ तुझे मिला है|
जब थक जाता मन मेरा है,
तेरे हाँथ को सर पे पता है|
सब साच ही कहते, माँ
तुझमे ही ईश्वर की काया है|
माँ तूने जीना सिखाया है,
इस नटखट को इंसान बनाया है|
चोट मुझे छोटी सी भी जो लगाती है,
आंखें सबसे पहले तेरी भीग जाती है|
सब साच ही कहते, माँ
तुझमे ही ईश्वर की काया है|
माँ तूने बलिदान बताया है,
निःस्वार्थ सेवा भाव तुझसे पाया है|
भूक तो तुझे भी शायद लगती है,
कहती हो हमेशा, तुम खालो मेरा पेट भरा है|
सब साच ही कहते, माँ
तुझमे ही ईश्वर की काया है|
माँ तेरे गोद में जन्नत है,
सुकून वैसा कहा कहीं और है|
बिकती बड़ी महंगी यहाँ नींद है,
पर तेरी लोरी का, कहाँ कोई मोल लगा पाया है|
सब साच ही कहते, माँ
तुझमे ही ईश्वर की काया है|
माँ तेरे कर्ज़ बड़े मुझ पर,
नहीं चूका सकता मैं कई जनम भर|
नादान हूँ, झल्ला जाता हूँ कभी तुझ पर,
माफ़ कर देना मुझे, तेरा हीं बच्चा समझकर|
कोई कुछ भी कहे, माँ
तुझ में हीं ईश्वर समाया है|
-उत्कर्ष भास्कर


