अदम्य उछाह की बहती धारा
भुजबल में हैं शक्ति अपार,
शोणित अक्ष अर्क सम माथा
नहीं शक्ति का पारावार ।

गुंजित है जय घोष से इनके
हिमवन सिन्धु वा मरु विशाल
बन प्रचण्ड़ अरिदल पर टूटे
ये रक्षक धरणी के लाल

अटल रहें सीमा पर ऐसे
जैसे शुभ्र ध्वल हिमराज
सजग रहें हर पहर घड़ी में
पूस जेष्ठ हो या ऋतुराज

दुर्गम दुर्जय रणभूमी हो
या हो गगन सिन्धु जलधाम
समर यज्ञ में अर्पित होते
कर देते प्राणों का दान

ले आहुती धन्य हो जाती
शुद्ध अनल शूरों के प्राण
नव दधिचियों की बाली पाकर
महि पाती वज्रों के त्राण ..!!