इन अश्को को बहने दूँ या फिर छुपा लूँ कहीं
कुछ परदे खोल दूँ या फिर ओढ़ लूँ नकाब नया कोई
मैं बगुला सा अडिग निज ध्येय पर
विश्वासघाती प्रपंच को सह नहीं सकता हूँ
अश्को को अपनों के सामने भी स्वागत हार पहना नहीं सकता हूँ
अपने ही घर लंका भेदी का जन्म होने नहीं दे सकता हूँ
मैं चाणक्य नीति पढने वाला सत्यवादी हरिश्चंद्र नहीं बन सकता हूँ
इसिलिए दशानन से भी ज्यादा मुखड़े साथ लिए मैं चलता रहता हूँ
दुनिया तुझे दिखाने को कमजोर नहीं मैं रूप बदलता रहता हूँ
नए -नए नकाब ओढ़ कर जीने का दस्तूर बदलता रहता हूँ
(अनावश्यक नकाबो का दुष्परिणाम )
भूल गया अस्तित्व क्या मेरा , मैं मेरा कौन खुद से पूछ रहा
अपने ही ओढ़े नकाबो बारे मे सोच रहा
लाख कोशिशो के बाद भी मैं खुद को अब पा नहीं पाता हूँ
हर बार और गहरे दलदल मैं खड़ा खुद को पाता हूँ
सोच कमल खिला करते दलदल मे क्षणिक प्रसन्न हो जाता हूँ
और अँधेरे तेरे आलिंगन का प्यासा मैं हो जाता हूँ
सोचता हूँ डूब घोर अंधर तिमिर मे
क्यूं मैंने नकाबो का यह खेल खेला
नकाबो के बोझ को उठा अब मैं नहीं पाता हूँ
खुलकर ज़िन्दगी को अब मैं जी नहीं पाता हूँ
हर अवसर मैं दुःख -विषाद मैं पाता हूँ
उड़ने को हैं पंख पर उड़ नहीं पाता हूँ
प्रीत की रीत को भी अमृत पान करा अब मैं नहीं पाता हूँ
शतरंज मेरा मुहरे मेरी पर सः-मात का खेल नहीं खेल अब मैं पाता हूँ
सोचता हूँ डूब घोर अंधर तिमिर मे
क्यूं मैंने नकाबो का यह खेल खेला ????????????
