जो लड़ने से डरा

जीते जी वो मरा


पहले मिटा मान

फिर नामोनिशान


इतिहास है गवाह

संघर्ष देता है राह


समर जो सजता है

शोणित भी बहता


बलिदान की स्याही से

इतिहास निखरता है


वक्त को मनमाफिक

करती हैं जिंदा कौमें


इतिहास वो लिखती हैं

निज पौरुष के रौ में