सावन में बढ़ जाती है हर

मन में विरह की अग्नि


बाहर बरसें फुहार मगर

हर मनवा दिखे उद्विग्न


नभ में गहराए बादल की

दशा दीवाने की भांति


रिमझिम फुहारें लगती ज्यों

प्रेमी नयनन से अश्रुपात


फुहारों का शोर ज्यों सागर

की लहरों की फुफकार


मन को ऐसा लगता जैसे प्रेमी

जन कर रहे सामूहिक मनुहार