जनता के निर्णय से बने
जो सत्ता के अहम वजीर
वे जनता का नुक्स गिना
दे रहे हैं लंबी लंबी तकरीर
दुनिया में यह अजूबा बस
भारत में ही हो सकता है
शिक्षा दीक्षा में फिसड्डी नेता
मंत्री बन लोगों पर विहंसता है
राष्ट्रीय कोष की धनराशि पर
खुद जब तब मनाते हैं जश्न
खुद के खर्चों के औचित्य पर
कभी सदन में नहीं उठाते प्रश्न
लाज औ हया रख ताक पर
नित करते नए-नए ऐलान
उनके दावों में बनता जा रहा
भारत पूरे जग में आलीशान
देश में सतत बढ़ती जा रही
है बेरोजगारों की फौज
राजनेताओं को कोई फिक्र नहीं
वे भोग रहे बस सत्ता की मौज
निशिदिन राजनेता अलाप रहे हैं
संस्थाओं के निजीकरण का राग
अलापों से ही साफ झलकता है
पूंजीवाद के प्रति गहरा अनुराग
