देश की हालत देख के
मन में उठते हैं सवाल
क्यों यह देश दिनोंदिन
होता जा रहा है कंगाल
अर्थव्यवस्था गर्त में पर
नेताओं को नहीं हैरानी
रोज ब रोज दावे करते
एक से एक आसमानी
राणा औ शिवा की संतति
भुगत रही है बदइंतजामी
क्यों उसने मंजूर कर लिया
अब सत्ताधीशों की गुलामी
आखिर क्यों वह भुला बैठा
है संघर्षों का अहम सबक
सत्ताधीशों के सामने घुटने
टेकने से मिलते नहीं हैं हक
जहाँ कहीं भी युवा शक्ति
संघर्षों से नजर चुराती
वहाँ स्वतंत्रता सच मायने
में अक्षुण्ण नहीं रह पाती


