राजनीति में अब कहाँ

नैतिकता और सिद्धांत


झूठ फरेब से ही तोड़ रहे 

सब दल एक दूजे के दांत


राजमहलों में दाखिल हो

चुके अगणित दागीदार


चीख चीखकर बतला

चुके हाकिम जिम्मेदार


सत्ता को कैसे अपराधी

तत्वों से रखा जाए दूर


कोई फार्मूला तय नहीं हो

सका संसद दिखी मजबूर


राजनीति में अब नहीं कहीं

ईमानदार लोगों की पूछ


इसी नाते चुनाव के बाद

जनता रहती सदा छूछ