जुगनू आज समाज के
सूरज को रहे ललकार
भूल गए के किसके बल
पर बना बैठे हैं सरकार
प्यादें आज आँखें तरेर रहे हैं
लोकतंत्र की मर्यादाएं भूल
भाग्यविधाता रूठा तो फांकनी
पड़ेगी सियासत में बस धूल
लोकेच्छा पर टिका सरकारों
का सब सियासी तामझाम
लोकभावना जो विरुद्ध हुई
तो ढह जाएगा पूरा निजाम
