सत्ता संतुलन के लिए चले

जा रहे नित दांव पर दांव


जनता सांस थामकर सोच 

रही आगे कौन सुरक्षित ठांव


जनता की तकदीर भी

अब कद्दू की ही भांति


जनप्रतिनिधि उन्हें देते

बस जख्मों की सौगात


कद्दू चाकू पर गिरे या

चाकू कद्दू पर ही कहीं


कटना ही नियति उसकी

जनता की दशा भी यही