राम, कृष्ण के देश में

अब कैसी मची अंधेर


राजनेता सुन ही नहीं

रहे माटीपुत्रों की टेर


कडकड़ाती ठंड में डाले हुए

खुले आसमान के नीचे डेरा


सत्ताधीश बातें सुन ही नहीं

रहे, मुश्किल में असल कमेरा


दावे करते थे जो कभी हर

दुख में साथ खड़े रहने का



वो अब तोहमत लगा रहे हैं

बैरियों की रौ में बहने का


नेताओं को रंज यही है के

किसान हो गए हैं गुमराह


पर उनको सुनाई पड़ती नहीं

कर्ज में डूबे किसानों की आह


जिले जिले में गूंज रहा है

धान उत्पादकों का शोर


फिर भी नेताओं औ तंत्र की

निगाहे जमी हैं कहीं और


ईश्वर देश के किसानों को

सुझाएं समय से सही उपाय


वो निज बाहुबल पर भरोसा

कर बनाए अपनी नई राह