ज़िंदगी इतनी परेशान हो गयी है

मेरी कलम भी हैरान हो गयी है


चाहता हु कुछ लिखती है कुछ

अब स्याही भी बेसवाद गयी है


चिथडे मे हूँ और कलम हाथ मे

मेरी पढाई भी गंवार हो गयी है


समेटकर पर जमीन पे बैठा हूँ

मेरे हौसलों मे दरार पड गयी है


कोई है मुझमे तो सामने आ ना

मेरी देह मुझपे उधार हो गयी है


मैं हो गया हूँ इक टूटा हुआ तारा

मेरी ख्वाहिश भी आग हो गयी है


~उमेश कुमार