सुबह गयी शाम का नज़ारा आगया

नाव क्या मोड़ी, किनारा आ गया


इश्क़ था उसको, उसे तो डूब जाना था

देखो तैरकर कैसे, वो बाहर आ गया


वो जिनको पार करना था, इश्क समंदर ये

उनको ज़रा देखो, उन्हें तो डूबना आ गया


वो जो साथ कूदे थे, सफर तय ये करने को

एक को धार ले डूबी, इक को किनारा खा गया


~उमेश