हर कली है फ़िक्रमंद अब हर काँटा नाराज है,

फैली खबर बहार मे, भौंरा गुलाब का प्यार है


सितम खुदा का होता तो, खुदा से ही हम कह देते

दिल के मरीज कह रहे, यहाँ पर हर शख़्श बीमार है


माली तोड़ गया हर फूल बाग का मालिक बनकर,

क्यूँ कर कलि फिर रोयेगी, अब किसका इंतज़ार है


भौंरा चूम रहा कलियाँ, मदमस्त किसी परवाने सा

अब शम्मा को बुझ जाना है, जल जाना बेकार है


चंचल पी मधु की धारा उड़ चला दूसरी बगिया को

काँटों के कटिले तानों पर, कलि का जीना दुश्वार है


तन काला मन भी काला आँखे काली काला चंचल

उजले यौवन की हाय कूक पर, अलि* का कैसा अधिकार है



~उमेश

अलि - भौंरा