गुनाह कर सर उठाये बोलता है,
गीता कि क़सम खाकर न्याय तौलता है।
अपने गुनाहों मे डाल पर्दा खड़ा हुआ है,
शातिर सा औरों के राज़ खोलता है।
नागों सा विष भरा है,उसमें
कशमकश भय मे देखो प्रेम घोलता है।
खड़ा है,झूठ और सच के तह में
नुमाइश ऐसी है कि बेखौफ़ डोलता है।
सच कि बुनियादें खिलाफ है,उसके
फिर भी वह झूठ हर बार बोलता है।
