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मेरी वफ़ादारी का यह सिला हुआ

जीती थी जिसने दुनिया शमशीर बन के 

लौटा था इस जहाँ से फ़क़ीर बन के 

मैं तो यूँ भी मंज़िलों पर ठहरता नहीं

क्या करोगी मेरी तक़दीर बन के



मेरी वफ़ादारी का यह सिला हुआ

यार मेरा था दुश्मनों से मिला हुआ

क़िस्मत के फ़ैसले से हम दोनों हैं नाख़ुश

जाने किसके हक़ में यह फ़ैसला हुआ


ना ज़्यादा कुछ समझा हूँ, ना ज़्यादा कुछ कहता हूँ

याद आऊँ कभी तो जी लेना, काग़ज़ पे उकेरा लम्हा हूँ

चंदा नहीं जो रात सजाऊँ, घट जाऊँ बड़ जाऊँ

छोटी सी

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