बुढ़ापा
एक दिन जब मेरी कमर झुक जाएगी, तुम मेरी बाँह पकड़ लेना
कुछ कहते कहते जुबाँ कहीं रुक जाएगी, तुम पूरी बात समझ लेना
हो सके तो मुझको सह लेना, इसे पिता का बचपन कह लेना।
जब सीख नहीं पाऊँगा मैं नयी बात और नया चलन
नयी तकनीक मेरी ख़ातिर, होगी एक नयी उलझन
जब समझ नहीं पाऊँगा मैं, जो मैंने था तुमको समझाया,
मेरी मुश्किल को हर लेना
हो सके तो मुझको सह लेना, इसे पिता का बचपन कह लेना।
कभी सुबह सुबह सोने कि ज़िद, कभी आधि रात की सैर
जब थर्रायेंगे हाथ मेरे और उल्टे सीधे पड़ेंगे पैर
जब चल नहीं पाऊँगा उन राहों पर, जो मैंने था तुमको दिखलाया,
तुम मेरी बाँह पकड़ लेना
हो सके तो मुझको सह लेना, इसे पिता का बचपन कह लेना।
जब तुम्हारा वक़्त क़ीमती होगा, और मेरे पास वक़्त ही होगा
मेरा तुमसे बतियाने का मन, बावक्त नहीं बेवक्त ही होगा
मेरी बेमतलब की बातें भले ना आयें तुमको रास,
तुम यूँ ही मेरी सुन लेना
हो सके तो मुझको सह लेना, इसे पिता का बचपन कह लेना।
जैसे एक सूखा बादल, जो कभी कहीं बरसा हो
फिरता हो खोया खोया, अकेलेपन का दर्द लिए
एक बूढ़ा चलता है, बस साये को अपने साथ लिए
दो कदम ही साथ में हो लेना
हो सके तो मुझको सह लेना, इसे पिता का बचपन कह लेना।
सारा जीवन जो किसी को दिल का हाल नहीं बताता है
बूढ़ा होने पर जाने क्यूँ सबको अपना हाल सुनाता है
शायद मैं भी उन ग़लतियों को दुहराऊँ, जिस पर मैंने तुम्हें डाँटा था,
मन करे तो तुम भी झिड़क लेना
हो सके तो मुझको सह लेना, इसे पिता का बचपन कह लेना।
पतझड़ में सूखा पत्ता और पका हुआ कोई फल
डाली से अलग हो जाएँगे, आज नहीं तो कल
मुट्ठी भर रेत की भाँति, दम जाने कब जाए निकल
कभी कभार खुद से ही, मेरी बातें कर लेना
हो सके तो मुझको सह लेना, इसे पिता का बचपन कह लेना।


