कोई रात का कायल है अंधेरा ढूंढता है...

कोई सुबह होने पर भी सवेरा ढूंढता है...


कोई ढूंढता है मकान एक घर बनाने को...

कोई घर में रहते हुए भी बसेरा ढूंढता है...


कोई ढूंढता है मिल जाये कोई साथ देने के लिए...

कोई हर किसी में उसके बिखरे हुए इश्क का चेहरा ढूंढता है...


कोई ढूंढता है खुद का मन भरने के लिए कुछ भी...

कोई भरा हुआ है इतना कि वो इक लूटेरा ढूंढता है...


सुना है के मन से ढूंढो कुछ तो मिल भी जाता है...

इसलिए मेरे खोये हुए मन को,मन ये मेरा ढूंढता है...