जो, हिंद अधूरा रह गया बिना सिंध के,
गंगा-जमुनी तहज़ीब भी हुई बदनाम ।
क्यों वीज़ा लगता है आज ढाका जाने को?
क्यों दूर हुआ मुझसे मेरा चट्टग्राम ?
जो ,गुहार न दी गई उस बंटवारे पर,
क़त्ल न होती उसमें शान-ए-हिंदुस्तान।
पेशावर न होता पराया, लाहौर भी अपना होता,
और अपना कहलाता आज भी मुल्तान!
जो लकीर न खिंचती जन्नत-ए-धरती पर,
कश्मीर न होता यूं खिताब से बेनाम।
मेरी तमाम सरज़मीं तब भी पाक कहलाती,
जो वजूद में न आता कोई अलग पाकिस्तान।
न बंग-भंग होता, न कारगिल की कहानी,
न होती वीरानी-ए-पुलवामा या पहलगाम।
