मानव ने बताया कल पहाड़ों पे पहली बर्फ़ गिरी है ...
फ़रहान ने बताया उसके खिड़की से दिखते उस समुद्र में एक नई लहर नज़र आयी है ... मेरे घर के आँगन में दिसम्बर के मौसम में आम के बौर नज़र आ रहे हैं ....,
मैं मानव से कभी नहीं मिली .... मैं फ़रहान से एक बार मिली हूँ .... मैं ख़ुद को.... शायद जानती हूँ ....
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दो दिन पहले इंस्टा पर शब्दहार पेज के लाइव सेशन में मैंने सुरम्या को जया का पूछा एक प्रश्न नीति से पूछते सुना .... उसने पूछा था writer’s block को कैसे हटाया जाए.... मुझे नीति का जवाब बहुत अच्छा लगा .... उसने कहा writer’s block ख़ुद से नहीं हटता .... किसी और को हटाना पड़ता है ....
सुनो ना..... मैं writer तो नहीं हूँ... पर हाँ एक block ज़रूर है.....
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मैंने क्षिप्रा को कहा एक लेखक की क़लम उसकी नहीं होती... वो अमानत होती है उसके पाठक की ....
मैं ... लेखक नहीं ... इसलिए मेरी क़लम मेरी है .....
पर सुनो .... तुम्हारे समक्ष खड़े होने के लिए मुझे लिखना होगा ....
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सुनो ना .... नहीं खोजूँगी ख़ुद को कभी शब्दों में तुम्हारे.... जानती हूँ मैं .... तुम मेरे लिए नहीं ख़ुद के लिए लिखते हो.... नहीं इठलाऊँगी देख कर तुम्हारी शोहरत को .... नहीं कहूँगी की तुम्हारी कहानी का मैं एक हिस्सा हूँ .... नहीं कहूँगी की मैं तुम्हारी क़लम से गढ़ा हुआ एक क़िस्सा हूँ ... नहीं करूँगी सुबह अपनी शब्दों से तुम्हारे..... ना ही इनसे लोरी मैं बनाऊँगी .... सुनो ना मैं बिना तुम्हारी आवाज़ सुने ख़ुद ही सो जाऊँगी .... सुनो ना... सुनो....ना ....
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मेरे हिस्से कभी काफ़्का नहीं आया.... मेरे हिस्से... कभी तुम भी नहीं आए..... तुम कहते हो तुम मेरे नीले दरवाज़े के पीछे ही हो .... मेरे अंदर कहीं शायद..... पर रात के तीसरे पहर जब तुम करवटें गिन रहे होते हो मैंने कभी तुम्हें अपने नीले दरवाज़े पर दस्तक देते नहीं देखा .... तुम्हारे लफ़्ज़ों को कभी अपने शब्दों पे पिघलते नहीं देखा ...
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दो दिन के लिए एक बिल्ली उधार लायी थी मैं ... .... सारा दिन मुझे बस उसकी ही धुन चढ़ी रहती .... वो भी मेरे आगे पीछे घूमती ... गोद में बैठ मेरी उँगलियों को अपने दाँतों तले दबाती पर कभी काटा नहीं उसने ...
उसके जाने पर बहुत रोयी मैं .... प्रेम में पड़ने में समय नहीं लगता .... प्रेम में मिला दुःख भी मीठा है ... ये मैं जानती हूँ.... पर जब पायल ने बताया तो ईश्वरीय लगा ....
उधार में मिली बिल्ली को मैंने सिर्फ़ दो दिन रखा अपने साथ .... उधार ज़्यादा दिन नहीं रखना चाहिए ....
तुम भी मुझे उधार में ही मिले हो इसलिए तुम पर मेरा हक़ नहीं है ... पर तुम मेरे वो उधार हो जिसे मैं लौटाना नहीं चाहती .... कुछ उधार लोग ले कर भूल जाते हैं ... असल में भूलते नहीं बस लौटाना नहीं चाहते और देने वाला ज़िंदगी भर याद रखता है...
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मेरी भागती दौड़ती ज़िंदगी में बहुत कुछ चलता है चारों तरफ़ ... ....पर अपने इस मन... आँख .... दिल ... दिमाग़ की भाग दौड़ में मैं तुम्हें कभी नहीं भूलती... तुम्हारी तस्वीरों में हाथ थामे रखती हूँ तुम्हारा ....
तुम कहते हो तुम जानते हो तुम शब्द हो मेरे ... जो आजकल पन्नों पे नहीं उतर रहा .... मैं इन्हें पन्नों पर तो उतार दूँ .... पर क्या इन्हें पढ़ने आओगे ... तुम ?
पढ़ने और पढ़ने में बहुत फ़र्क़ होता है ...
ये बात drsimple की लेखनी जैसी तो है पर इतनी simple नहीं है ... ख़ैर...
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लिखना मेरा बस का कभी नहीं रहा ....लिखने की कला को जानने के लिए शब्दों की गहराई में उतर भावों को चुनना होगा .... शब्दों का समूह प्रशांत महासागर सा है जिसमें तैराक होने पर भी डूबना आसान है .... पर पार लगाना शायद मुश्किल .... वैसे मैंने कभी पार लगाने की कोशिश भी नहीं की ... मुझे हर रोज़ डूब जाना अच्छा लगता है ... शायद इसलिए क्योंकि मुझे कभी लिखना नहीं आया या शायद इसलिए की तुम को मैंने अक्सर किनारे पर खड़ा देखा है ....
क्या तुम जानते हो.... मैंने तुम्हारे हिस्से वाले तुम की कभी चाहत नहीं की ... मैंने ख़ुद को भी तुम्हारे हिस्से वाले तुम में कभी नहीं डाला... मैं तो सिर्फ़ इतना चाहती हूँ की मेरे हिस्से जब भी आना .... अपना वो हिस्सा ले कर आना जहाँ रहो सिर्फ और सिर्फ़.... मेरे तुम..!
©LightSoul
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गानों से बहुत क़रीबी दोस्ती है मेरी अकसर मैंने उन्हें अपने तकिए पे सिर रख सुस्ताते पाया है ...
फ़ोन को नीचे रख आँखें बंद कर लेट गयी मैं ... ना रेडीओ चल रही ना कोई टेप रिकॉर्डर .... पर फ़ुल वॉल्यूम में सुनाई दे रहा मुझे ये गाना ...
“तारों भरी इक रात में, तेरे ख़त पढ़ेंगे साथ मेकोरा जो पन्ना रह गया, एक कांपते से हाथ में
थोड़ी शिक़ायत करना तथोड़ी शिक़ायत मैं करूनाराज़ बस ना होना तू ज़िन्दगकुछ तो बता ज़िन्दगी.... अपना पता ज़िन्दगी...”
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माफ़ कीजिएगा ... कुछ लिखा तो नहीं ....
पर कुछ शब्द बिखेरे हैं.... आपके समक्ष... हो सके तो पिरो लें .... या यूँ ही बिखरा रहने दें... जाने क्यूँ बिखराव मुझे सगा सा लगता है ....
कुछ नहीं अपने नीले दरवाज़े की चौखट पर बैठ ....
बस यूँ ही .....
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