किससे पूछे,कौन बताए जिससे समझ आए ये ज़िन्दगी। रोज़ सुबह निकलता है कोई ढूंढने पता-ए-ज़िन्दग़ी। मिलता है फ़रेब,धोखा रोज़ है नई ख़ता-ए-ज़िन्दग़ी। मिल जाये किसी को तो ज़रा हमें भी बताए ज़िन्दगी। काश की उनको भी मिल जाती हमारे नाम की सज़ा-ए-ज़िन्दग़ी। खैर मंज़िल तो मौत ही हैं हो जितनी भी हसीं राह-ए-ज़िन्दग़ी।