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जीवन की बढ़ती व्यस्तता

जिंदगी इतनी व्यस्त हो गई है,
समय की गति तेज हो गई है ।
समय के साथ चलते चलते,
मानो जिंदगी पीछे हो गई है ।

जरूरतें पूरी करने घर से निकलता है,
पता नहीं इंसान कहां कहां भटकता है ।
तेज धूप हो या फिर बारिश की रिमझिमाहट,
सब सहकर इंसान घर लौट निकलता है ।

सुबह से शाम हो जाती है,
रात में जिंदगी थक सी जाती है,
थक हार बिस्तर पर पड़कर,
पता नहीं सुबह कब हो जाती है ।

कोई नौकरी पर जा रहा है,
तो कोई व्यापार चला रहा है ।
दिनभर की इस भागादौड़ी में,
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