आज़ादी का अर्थ हम समझ नहीं सकते,
इसका मोल कभी चुका नहीं सकते ।
कतरा कतरा खून से लिखी गई कहानी है,
सेनानियों के बलिदानों की ये अमर कहानी है ।
कितनी ही पढ़ लो किताबें, कितना ही पढ़ लो इतिहास,
इसके दर्द भरे गहरे घाव का हमें नहीं है एहसास ।
इसके खातिर ना जाने कितनी शहादतें हुई,
एक पल ना रहता सुकून ऐसी कितनी रातें हुई ।
दिन भर के अनेक संघर्षो से वो थकते नहीं थे,
अपनी मातृभूमि के खातिर जातियों में बंटते नहीं थे ।
हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सब हुआ करते थे,
अनेक जातियां थी फिर भी वो भाई हुआ करते थे ।
गुलामी की जंजीरों को तोड़ने का हुनर जानते थे,
देश के लिए सर्वोच्च फर्ज़ निभाना जानते थे ।
अपनी परवाह किए बिना भविष्य नया लिख रहे थे,
स्वाधीनता का नया बीज इस मिट्टी में बो रहे थे ।
जोश और जुनून इस कदर सर पे चढ़ा होता था,
कांपते थे पैर दुश्मनों के जब देशभक्त खड़ा होता था ।
अपने रक्त की हर एक बूंद तक जो हमारे लिए लड़ गए,
हमारे ही खातिर वो हंसते हंसते सूली पे चढ़ गए ।
उनके दिए बलिदानों का हम कर्ज उतार नहीं सकते,
अपने स्वार्थ के खातिर उनको भुला नहीं सकते ।
देश के खातिर मर मिटने वाला हर एक शहीद अमर हुआ,
इसके खिलाफ़ जो खड़ा हुआ वो जीते जी दफ़न हुआ ।
आज़ादी के रथ का जो स्वयं चालन कर रहे थे,
कृष्ण की तरह देश का वो मार्गदर्शन कर रहे थे ।
उन्हीं के मार्गदर्शनों से हमें सुनहरा दिन मिला है,
आज़ादी का सुंदर फूल उन्हीं के कारण खिला है ।
इस खिले हुए फूल को कभी मुरझाने ना देना,
आज़ादी हमें कैसे मिली इस बात को भुला ना देना ।
: तुषार "बिहारी"


