जातें जातें नादानीया जायेगी
आते आते संजीदगी आयेगी
ग़म तो कई बार चलें आते हैं
इक रोज़ खुशी भी आंगन आयेगी
आंसू रूला के जा चुके हैं
अब चेहरे पर हंसी आयेगी
तपती धरती तरस रहीं हैं
जाने कब बरसात आयेगी
वो शहर में तो आ गई हैं
एक दो रोज़ में मेरे घर भी आयेगी
दादी नानी नहीं रहें अब
कहाँ जायेंगे बच्चे जब छुट्टियाँ आयेगी
जाते हुए मैंने पुछा था
तू लौट के तो आयेगी
जितनी मिलीं हैं तबीयत ये जी लो
सांसे गई तो फ़िर नहीं आयेगी
तुषार माथुर
