Poetry 1 min read 45.1K reads

"आरज़ू बस्ल की"


अज़ल से आरजू _ए वस्ल है मुझकोभुला कर याद तेरी शक्ल है मुझको

उसे अपना कहूं या फिर कहूं बेगानामगर इतनी तो यारों अक्ल है मुझको

मेरा अखलाक ही पहचान है मेरीमयस्सर ही ये ऐसी नस्ल है मुझको

— Shayer ✍️ Tufail Adeeb
Read more Earn more Learn more