रे मुर्ख उठ कहा सो रहा तू तेरी मंज़िल तुझे पुकार रही है कहा रो रहा है तू ,ये नवल धरा ये नवल ज्योति तुझसे हिसाब मांग रहा है कहा छुपा था अभी तक ये बात पूछ रहा है ,तेरी हस्ती तुझमे डूबी है ये बात साल रहा है ,लाख कुटिल हो ह्रदय फिर भी जान दे रहा है, अपनी उम्मीदों को तुझमे देख हर साल जी रहा है रे मुर्ख उठ खा सो रहा है तेरी मंज़िल तुझे पुकार रही है ,कहा रो।रहा है तू कर दे अपना सर्वश्र न्यौछावर ये बात बोल रहा है ,हो जाए यौवन भस्म ये हाल बोल रहा है तेरी एक तर्पण से सबका नाम होगा तेरी एक समर्पण से सब काम होगा ऐसी हसरत पाल सब संसार बोल रहा है रे मुर्ख उठ कहा सो रहा है ,तेरी मंज़िल तुझे पुकार रही है कहा रो रहा है तू Composed By -Pawan Tripathi