नांदिया स्रोत पर ही सुख जाये तो प्रवाह कैसे होगा हम चलने से पहले डर जाये तो आगाज़ कैसे होगा आँखों से जगत को देखे तो संवेदना उमड़ने लगता है कलम का सिपाही बनने से जबान से झरना फूटने लगता है दहलाने की की साज़िश का रस चखकर मन असहज हो जाता है 1 अपने अनुभव की अभिव्यक्ति क्या करूँ कभी कभी ही छलक पाता हूं औरो की बेबसी को सोचकर भी कभी कभी ही जिक्र कर पाता हूं अपनी उतेजना से अक्सर जज्बातों मे ही सिमट जाता हूं 2 पड़ी की पड़ी रह गयी है मुसीबत का कुनबा जिसे आज तक न स्पर्श कर पाया हूं आते जाते देखा बहुतो को पर बक्तव्य से निकलकर परिणाम तक ना किसी को पहुचता देख पाया हूं नांदिया स्रोत पर ही सुख जाए तो प्रवाह कैसे होगा ,हम चलने से पहले डर जाये तो आगाज़ कैसे होगा Composed by -Pawan Tripathi