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जाने क्या लिखती मिटाती हूँ

"जाने क्या लिखती मिटाती हूँ"


जाने क्या लिखती मिटाती हूँ

दिल के पन्ने सिमटाती हूँ

अकेलेपन में मुस्काती 

तन्हा भीड़ में भी हो जाती हूँ।


कभी दिन-दिन गिनती उंगली पर 

कभी पल दो पल जी जाती हूँ

कभी चार कदम में थक जाती

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