शील धरूं मैं शीलता और सौम्यता,
हुं सरल औ सहज अगर समझ सके तो तू समझ
नहीं तो बिन सुलझी पहेली सी हूं मैं जटिलता
कभी मासूम, नादान और नटखट सी मैं चंचलता
प्रेरित करूं तो मैं प्रेरणा,
कभी ऊर्जा बन भरूं मैं तुझ मे वो चेतना
कभी प्रेम में मैं प्रेयसी, मैं प्रेमिका
जैसी कृष्ण की हो राधिका
बनी वेदना भूली जो संवेदना
अर्धांगिनी के रूप मे मैं हूं समर्पित संगिनी
जैसे अर्धनारीश्वर शिव शम्भू के संग पार्वती
वात्सल्य से भरी मां हुं मैं ममतामयी
कभी शब्दों से भरी हूं मैं शब्दिता
कभी मौन से भरी निशब्द आह!
मैं ही प्रथम शिक्षिता मैं शारदा, मैं सरस्वती
मैं ही समृद्धि औ संपन्नता मैं धन लक्ष्मी, मैं गृह लक्ष्मी
धन धान्य से भरूं सदा ऐसी मैं अन्नपूर्णा
सम्मान दो तो हूं जगदात्री कि जैसे मां दुर्गा
और बात आए जब स्वाभिमान पर
तो अबला से बनी है ये नारी सबला
अन्याय पर चपला सी गिरे बन के जैसे
क्रोध में अवतार ली थी मां काली औ चंडी का
मैं "नारी शक्ति की परिचारिका",
जो अगर तुम नर रहो तो,
मैं सदा से ही हूं यहां नारायणी, मैं जगदंबिका
दीप्ति रस्तोगी✍️


