शोणित पात से
व्याप्त है जगत जगत,
धर्म क्षीण कर्म क्षीण
स्वाँस है धमक धमक,
चेतना है क्षिरसागर
सर्प है विवेचना,
घमर घमर निस्प्रभ मेध,
गिरि है तुम्हारा आत्मबल,
देव भी तुम दानव भी तुम,
रूद्र, केतु, राहु, मोहिनी,
कच्छप, वृक्ष,अश्व,एरावत,
रत्न- मणि, बलि भी तुम,
शंख पात्र हलाहल का
या स्वर्ण कलश सोम का,
क्या व्यर्थ है क्या संचय,
यही तुम्हारा प्रगाढ़ सत्य,

