हम अब क्या कहें हम पे क्या गुज़री है

ज़िंदगी इक मुक़ाम पे ठहरी सी गुज़री है


पर जब  लगे तो  जीये  हम  परवानों  से

एक हीं आग से कई बार गुज़र के गुज़री है


किताब दर किताब चट किये दीमक हैं

उम्र इन्हीं मुनाफ़िक के रहबरी में गुजरी है


ना किया किसी ने मोहब्बत ना किए हैं

इंतज़ार ये बिला करार  सी  गुजरी है


थी हाथों में घुमावदार धारी बंजारों से

निशाँ  पैरों  के  याँ- वाँ से गुजरी हैं


अपना किया क्या की कहे हम “त्राण”

ये एक बे-तरतीब की सी गुजरी है