मैं जानता हूँ 

तुम मिलोगी तो मुझको 

जैसे चाँद को मिलती हैं सूरज की शुआएँ 

इतना आकर्षण तो है मेरा तुमपे

पतझड़ के लिए हीं सही 

मुझेपे आओगी तो बहारों की तरह

तुम्हारे शाख़ों पे मेरा विरह तो उगा हीं होगा 


बरसों पहले जो प्रेम फूटा था आज कहकशाँ सा बिखरा है


तुम वियोग में कृष्ण विवर सी जो दमकती हो

तो मुझे समेट लो,तुम में लोप हो जाने दो

हमें मिलना तो तय है 

इतना आकर्षण तो हमेशा शेष रहेगा तुम्हारा मुझपे।