अब तुमसे कहूँ भी तो क्या

वो जब तितलियों सा उड़ता था पेट में 

अब एक ख़्वाब का सा है


बुझी मोमबत्तियों का मक़बरा 

अनगिनत शब्दों का गड्ढा उँगलियों पर 

अब एक बयार का सा है


सुबह और रात दोनों नहीं जब

झुरमुट भी तारों का सोने लगे जब

आँखों को मेरी तलब लगे जब

उस वक्त से इंतज़ार 

अब एक मे’यार का सा है 


आना या ना आना 

मायने नहीं अब 

कुछ था या नहीं 

ज़रूरी नहीं अब


तुम हो

मैं हूँ


तुम थी

मैं था

अब एक एहसास का सा है।