मैं तहजीब से पेश आया करता था,वो मुस्कराया करती थी।
मैं उसके आंखों में डूबा रहता था,और वो डुबोये रखती थी ।
मजहबी रंग से ना फर्क था उसको,मोहबब्त की इनायतें मुझे पढाया करती थी ।
अकेली वो आयी थी फलक से,और ख्वाबो से मुझे जगाया करती थी ।
प्रेम राधा सा और विश्वास मीरा सा ,दिखाया करती थी ।
मुझे कभी छलिया तो ,कभी श्याम वो बुलाया करती थी।
कभी टूटने ना दिया ,चमकते सितारों को उसने।
कोई और मांग लेगा तुम्हे ऐसा बताया करती थी।
पूरे फलक में एक ऐसी नुमाइंदगी थी उसकी
जो अपने हिबड़े मे मुझे छुपाये रखती थी ।
पाक थी वो मस्जिद की अजानों की तरह ,मूर्तियों की तरह दिखावा करती थी ।
मोहब्बत करती थी वो हमेशा राधा की तरह ,अंजाम रुक्मिणी की तरह देना चाहती थी
मैं तहजीब से पेश आया करता था ,और वो मुस्कराया करती थी ..........
मेरी दहलीज की मिट्टी भी कर्जदार है, उसके हर पग छाप की।
फरिश्ते की तरह वो हर जुम्मे को ,आया करती थी ।
ये ख़ुदा कर्ज है तुझ पे,मेरे उस महजबी का।
तेरे हालातो के बावजूद भी ,तुझे माफ किया करती थी ।
अपने हिज्र में अपने आंसुओ को ,श्रृंगार बनाया उसने।
तब भी वो मेरे लिए ,मुस्कराया करती थी ।
मतलबी तालीम देते थे ,फलसफे के लिये मुझको
वो मुझे अपनी जान कह कर बुलाया करती थी ।
मैं तहजीब से पेश आया करता था ,वो मुस्कराया करती थी................
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