उठा के बोझ कामो का,दर बदर भटकता हु।
खाके ठोकर नामो का,जलिलत से गुजरता हु
कई ने रख दिये नायाब,नामो का जखीरा
मैं उड़ती हुई पतंग की तरह,हवाओ में ही बहता हु।
टूटी बदन को यू लपेटे ,देखता तारो को मैं ।
पाप ऐसा क्या किया ,जो गालियां सुनता हूं मैं।
सजे सब सूट बुटो में ,फटे कुर्तो को जब देखा
अकेले बंद कमरे में ,टंगे पंखे को देखता हूं मैं।
मैं मजदूर हु साहब ,ठोकर खाने को दिन रात दौड़ता हु मैं ।


