कलियाँ डरती है खिलने को अब बाग में 

पत्तियां साथ डरती है ,अब डाल में।

चाहे बेला ,गुलाब हो या सूरजमुखी ।

कुछ भवरे है ऐसे जो ,घूम रहे दिन रात में 


चाहे कच्ची कली ,हो या मधुबन की जान 

कूक कोयल की अब तो ,रुदन हुई मान।

जब नाच रहे गिद्ध ,लिए कपटी की बान

झुक गया भारत माता का,आन बान और शान।


रोज दिखता ये दृश्य ,परिदृश्य किया जाता है ।

बहु बेटियो की आबरू को ,धूमिल किया जाता है ।

चंद कीमत लगा के ,शांत उनको तो कर दिया 

पर कूक कोयल की ,उस बगिया को सुना किये जाता है ।


बाप की जिंदगी बेटी में ही रहा ।

उसके उड़ने के सपनो को संजोए रहा।

क्या रुक जाएगी ?इस जहन्नुम में कुछ दिन तलक।

ये सोच के वो बाप हर दम जीता रहा।


दृग गंगा की जैसे माँ की हुई 

बाप यू ही धरा में शिथिल हो गया 

भाई की भी कलाई अब काटी गई 

लाडो को एक बार भी ,देखने ना दिया।


नाम बलरामपुर ,हकीमपुर हो या करतारपुर ।

नामो में ना रखा ,जिंदगी का कोई नूर 

उसकी बच्ची सुरक्षित ,अगर कर सको ।

तुमको माने हम ,इस धरती के जी जी हुजूर।


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