
कलियाँ डरती है खिलने को अब बाग में
पत्तियां साथ डरती है ,अब डाल में।
चाहे बेला ,गुलाब हो या सूरजमुखी ।
कुछ भवरे है ऐसे जो ,घूम रहे दिन रात में
चाहे कच्ची कली ,हो या मधुबन की जान
कूक कोयल की अब तो ,रुदन हुई मान।
जब नाच रहे गिद्ध ,लिए कपटी की बान
झुक गया भारत माता का,आन बान और शान।
रोज दिखता ये दृश्य ,परिदृश्य किया जाता है ।
बहु बेटियो की आबरू को ,धूमिल किया जाता है ।
चंद कीमत लगा के ,शांत उनको तो कर दिया
पर कूक कोयल की ,उस बगिया को सुना किये जाता है ।
बाप की जिंदगी बेटी में ही रहा ।
उसके
Read More! Earn More! Learn More!
