सर पे मोर पंख ,मुरली हाथ मे विराज रही
पावन लुभावन मनभावन ,छटा मोरे हिया में समाई रही
मुख मंडल पे तेजपुंज ,पग घुघरू लुभाई रही
ऐसो गोपाल मेरो ,आज ब्रज में पधार रहो
ऊपर से श्याम ,अंतरंग हिम् ते लाग रही
गोपियो के सौतन सो, वो मुरली बजाई रही
देवगण सुर मुनि, आज डमरू बजावत है
मेरो छैला विहारी आज,रास भी रचाई रहे
बचपन मे गइया,तो मइया भी साथ रही
बड़े होत भईया को ,कंधन में नचावत है
मईया के भईया को तारन ,यो छैला है
ऐसो कहानी सब ,मथुरा में सुनाई रही


