#internationalwomensday2021 


तुम्हारा रूप एक ही नही ,तुम अनेको में हो ।

तुम एक घर मे ही नही ,सर्वस्व मुल्क में हो ।

जब हल्की सी चोट, भी लगती इन दुनिया की झोको से

जुबाँ से निकली ,हुई पहले आवाज में तुम हो ।


(दादी )

बचपना बीता ,अब लड़कपना बीता ।

दादी तेरे गोंद में, ये सपना बीता।

मुकद्दर प्यार की गहराई से ,नवाजा सबको 

पहली रूप में ये जिंदगी ,दादी तेरे साथ बीता।


(माँ)

दूसरी मूर्ति, जिसमे ममता ही बसी ।

दुनिया उसको नाम ,माँ का दे चली ।

लाख गर्दिशों की महफ़िलो में ,आंधिया क्यो ना चले 

तेरे गोदी में है जन्नत ,और दुआवो में है फूलो की कली।


(पत्नी)

यू जगत के निर्माण मे ,आगे खड़ी रही ।

हलचल मचा था मुल्क में ,तुम यू ही अडिग रही ।

यू साथ संगिनी,तुम तरंगिनि रही ।

याद सात जन्मों का, देते वो रही ।

अधर्म को त्याग ,धर्म की ओर ठकेलती रही।

मेरे बिखरे हुए घर को ,वो समेटती रही ।


(दोस्त और बहन)

कभी बनी दोस्त ,तो कभी बहना बनी ।

पूरे रिश्ते को लिए ,तुम गहना बनी।

सवारती हो मुल्क को ,एक घड़े की तरह 

तुम कई रूप मे ,जीने का आसरा बानी।


(बेटी)

बनके तुम बेटी ,जिम्मेदारी को सिखलायी।

थक के घर आने पर,प्यार से पानी पिलायी ।

ता उम्र चंचल हवाओ की तरह ,उड़ती रही।

बड़ी होके बाप से जुदा होके ,अलविदा हो गयी 


कई रूपो में आपके साथ