सूखी नदियों में ,
बंजर खेतों में !
उजड़े बागों में ,
पतझड़ के पेड़ों में!
भटकते प्यासे पपीहे के लिए,
कौन बदल बनकर,
रिमझिम बारिश की फुहार लाएगा?
मसीहा कब आएगा?
जिन सूनी आंखों के लिए,
नहीं उम्मीद की किरन!
माटी का खिलौना,
जैसे सोने का हिरन!
उनकी भूख सी काली रातों के बाद,
क्या सेब सा सूरज मुस्कुराएगा ?
मसीहा कब आएगा ?
कितने जुल्मों का,
आज तक इंसाफ बाकी है!
कितने अश्कों का,
आज तक हिसाब बाकी है!
तारीख की कब्र में जो मिट्टी बन गए,
अदालत उनके लिए कौन लगाएगा ?
मसीहा कब आएगा?

