कितनी नावों में?
अब और कितनी बार ?
तोड़ गए वादे सब,
छोड़ गए मझधार!

कब का डूब जाता मैं ,
जो लहरें न देतीं उबार।
मिलता कहां मुझको किनारा?
जो साहिल ना सुनता पुकार!

तू फिर मुझे आवाज ना दे!
ओ मांझी न कर मुझसे करार!
छला गया है मुझको हमेशा,
जो भी बना मेरा खेवनहार!

बेशक तेरी आंखों में वफा है ,
काबिल-ए-यकीं है तेरा करार!
मगर क्या करूं अपने नसीब का?
तू नहीं, तो शायद दगा दे तेरी पतवार!

टूट चुकी उम्मीद मेरी ,
उठ चुका सब ऐतबार!
अब किसी भी नाव में ,
और नहीं इस बार!!