दी गई है जिंदगी प्यार के लिए!
तड़प रही है ये ज़मीं बहार के लिए!
उतारा जाएगा स्वर्ग कब ज़मीन पर?
उम्र छोटी है ये , इंतजार के लिए!
धरा के फूल ,आज रूप क्यों बदल रहे?
बन के शूल ,खुद ही को क्यों छल रहे?
खिलना भूल ,शाखों में ही क्यों जल रहे?
बनफूल भी बचे नहीं सिंगार के लिए!
दी गई है जिंदगी...
छीनकर किसी का हक ,तुझको कुछ मिले तो क्या ,
सींच कर लहू से बाग, गुल कोई खिले तो क्या ,
किसी के हाड़- मांस पर ,बने महल -किले तो क्या,
ये क्या से क्या तू हो गया झूठे मयार के लिए!
दी गई है जिंदगी प्यार के लिए

