जन-गण-मन में जिस दिन

आत्मबल की अलख जगाएँगे,

और तोड़ सियासी चक्रव्यूह,

मसीहाई बुत गिराएँगे।

तब परिवर्तन-पवन चलेगी,

दौर क्रांति का आएगा!

दुर्बल छोड़ देंगे जब रखना ,

आस रक्षकों के दर से।

हिरण विवश हो सिंह बनेंगे,

हिंसक भक्षकों के डर से।

डर के सौदागरों का तब,

मंसूबा धरा रह जाएगा।

न खाएगा भय कोई भी,

जब तुमुल रणवाद्य बजेंगे।

और जौहर की आग से पहले,

वीर साका के वेश सजेंगे।

तब चीर गगन की छाती को,

यह केसरिया लहराएगा।