दर्द मैंने दिल में दबाया,अश्क आंखों में छुपाए !
जीवन के अंधे समर में ,हुआ आहत हारा कई बार!
पर न दर्द बना बुजदिली,न याचना बनी ललकार !
हार -जीत स्थाई नहीं ,न जख्म सदा रहते हरे ।
और लड़ना ही है नियति,जख्म भरे चाहे न भरे ।
बस यही सोच ,प्राणपण से लड़ता रहा ।
टूटे हुए हथियार चलाता ,घायल गिरता पड़ता रहा ।
हर हार ऐसी थी मगर,कि हौसला भी तिलमिलाए !
दर्द मैंने दिल में दबाया ....
(शेष अगले भाग में...)

