तेरे जिस्म से निकली आग हूँ मैं

जो तेरे किरदार को सजाए 

वो वफादार साथ हूँ मै माँ,


कोई करना चाहे तेरी रूह गन्दी

आँख दिखा कर डरा दू

ऐसा भड़कीला राग हूँ मैं,


ना डर तू मुझे अकेला छोड़ का

तेरे ही हिस्से का सुराग हूँ मैं,


दरखास्त हैं तुझसे की

मेरी ही चिंता तू विशेष दिल में मत लिए बैठ

तेरे ही भाग्य का इनाम हूँ मैं,


मैं खुद की चाह में

तेरी राह भूल बेठी हूँ,

मगर ए- माँ यकीन कर

तुझे खोना मुझे भी असहज लगता हैं

तभी तोह तेरी हर सिख एक नए तोहफे सी लगती हैं,


तेरे ही जिस्म से निकली आग हूँ मैं

जो तेरे किरदार को सजाए

वो वफादार साथ हूँ मैं माँ।।