
उस रोज भीड़ में मैं भी खड़ा था
सामने खून में लतपथ कोई पड़ा था
उसे यकीन था कोई तो आगे आएगा
जिस उम्मीद से हाथ उसका आगे बढ़ा था.
फिर देख भीड़ की चुप्पी बोला इंसान कौन यहाँ सच्चा है !
अगर ये दुनिया है तो मर जाना ही अच्छा है.
फिर जो कहाँ था उसने वो सच हो गया,
न उठ सके कभी वो ऐसी नीं
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